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बिनोमो दलाल की संक्षिप्त

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इसके बाद फ़्रैडिक लेप्ले, डंकन, मैकाइवर, बोगर्डस, मैरिल तथा एलरिज ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए।

समाजशास्त्र। Samajshastra का अर्थ एवं परिभाषा। sociology

जो विज्ञान समाज के लिए हो उन्हें हम साधारण शब्दों में समाजशास्त्र कहते हैं। समाजशास्त्र के अंतर्गत समाज के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन किया जाता है। प्रस्तुत लेख में समाजशास्त्र का विस्तृत रूप से अध्ययन करेंगे तथा विभिन्न पहलुओं को भी बारीकी से जानेंगे।

Table of Contents

समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा Samajshastra

समाजशास्त्र एक नया अनुशासन है अपने शाब्दिक अर्थ में समाजशास्त्र का अर्थ है – समाज का विज्ञान। इसके लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द सोशियोलॉजी लेटिन भाषा के सोसस तथा ग्रीक भाषा के लोगस दो शब्दों से मिलकर बना है जिनका अर्थ क्रमशः समाज का विज्ञान है।

इस प्रकार सोशियोलॉजी शब्द का अर्थ भी समाज का विज्ञान होता है।

परंतु समाज के बारे में समाजशास्त्रियों के भिन्न – भिन्न मत है इसलिए समाजशास्त्र को भी उन्होंने भिन्न-भिन्न रूपों में परिभाषित किया है।

अति प्राचीन काल से समाज शब्द का प्रयोग मनुष्य के समूह विशेष के लिए होता आ रहा है।

जैसे भारतीय समाज, ब्राह्मण समाज, वैश्य समाज, जैन समाज, शिक्षित समाज, धनी समाज, आदि।

समाज के इस व्यवहारिक पक्ष का अध्यन सभ्यता के लिए विकास के साथ-साथ प्रारंभ हो गया था।

अन्य महत्वपूर्ण लेख –

हमारे देश के बाद इस क्षेत्र में यूनान (ग्रीस) का नाम आता है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो 427 से 347 ईसवी पूर्व पाश्चात्य जगत में सबसे पहले व्यक्ति हैं , जिन्होंने समाज के स्वरूप की व्याख्या करने का प्रयत्न किया।

उसके बाद उसके शिष्य अरस्तु 384 से 322 ईसा पूर्व ने मनुष्य को एक चेतन एवं सामाजिक प्राणी के रुप में स्वीकार कर उसे आपसी संबंधों के अध्ययन का शुभारंभ किया।

पाश्चात्य जगत में यह दोनों व्यक्ति समाज शास्त्र के आदि विचारक माने जाते हैं।परंतु स्वतंत्र शास्त्र के रूप में समाजशास्त्र का विकास 19वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ।

फ्रांसीसी दार्शनिक कॉम्टे 1778 से 1857 ईस्वी सबसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने समाज के वैज्ञानिक अध्ययन का शुभारंभ किया।

प्रारंभ में तो उन्होंने अपने इस अध्ययन को सोशल फिजिक्स सोशल फिजिक्स की संज्ञा दी, परंतु आगे चलकर इसमें कुछ सोशियोलॉजी शब्द का प्रयोग किया।

समाजशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा Samajshastra

समाजशास्त्र एक नया अनुशासन है अपने शाब्दिक अर्थ में समाजशास्त्र का अर्थ है – समाज का विज्ञान। इसके लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द सोशियोलॉजी लेटिन भाषा के सोसस तथा ग्रीक भाषा के लोगस दो शब्दों से मिलकर बना है जिनका अर्थ क्रमशः समाज का विज्ञान है।

इस प्रकार सोशियोलॉजी शब्द का अर्थ भी समाज का विज्ञान होता है।

परंतु समाज के बारे में समाजशास्त्रियों के भिन्न – भिन्न मत है इसलिए समाजशास्त्र को भी उन्होंने भिन्न-भिन्न रूपों में परिभाषित किया है।

अति प्राचीन काल से समाज शब्द का प्रयोग मनुष्य के समूह विशेष के लिए होता आ रहा है।

जैसे भारतीय समाज, ब्राह्मण समाज, वैश्य समाज, जैन समाज, शिक्षित समाज, धनी समाज, आदि।

समाज के इस व्यवहारिक पक्ष का अध्यन सभ्यता के लिए विकास के साथ-साथ प्रारंभ हो गया था।

अन्य महत्वपूर्ण लेख –

हमारे देश के बाद इस क्षेत्र में यूनान (ग्रीस) का नाम आता है। यूनानी दार्शनिक प्लेटो 427 से 347 ईसवी पूर्व पाश्चात्य जगत में सबसे पहले व्यक्ति हैं , जिन्होंने समाज के स्वरूप की व्याख्या करने का प्रयत्न किया।

उसके बाद उसके शिष्य अरस्तु 384 से 322 ईसा पूर्व ने मनुष्य को एक चेतन एवं सामाजिक प्राणी के रुप में स्वीकार कर उसे आपसी संबंधों के अध्ययन का शुभारंभ किया।

पाश्चात्य जगत में यह दोनों व्यक्ति समाज शास्त्र के आदि विचारक माने जाते हैं।परंतु स्वतंत्र शास्त्र के रूप में समाजशास्त्र का विकास 19वीं शताब्दी में प्रारंभ बिनोमो दलाल की संक्षिप्त हुआ।

फ्रांसीसी दार्शनिक कॉम्टे 1778 से 1857 ईस्वी सबसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने समाज के वैज्ञानिक अध्ययन का शुभारंभ किया।

प्रारंभ में तो उन्होंने अपने इस अध्ययन को सोशल फिजिक्स सोशल फिजिक्स की संज्ञा दी, परंतु आगे चलकर इसमें कुछ सोशियोलॉजी शब्द का प्रयोग किया।

समाजशास्त्र मानव समाज का अध्ययन है।

यह सामाजिक विज्ञान की एक शाखा है, जो मानवीय सामाजिक संरचना और गतिविधियों से संबंधित जानकारी को परिष्कृत करने और उनका विकास करने के लिए, अनुभवजन्य विवेचन और विवेचनात्मक विश्लेषण की विभिन्न पद्धतियों का उपयोग करता है।

अक्सर जिसका ध्येय सामाजिक कल्याण के अनुसरण में ऐसे ज्ञान को लागू करना होता है।

समाजशास्त्र की विषयवस्तु के विस्तार, आमने-सामने होने वाले संपर्क के सूक्ष्म स्तर से लेकर व्यापक तौर पर समाज के बृहद स्तर तक है।

समाजशास्त्र, पद्धति और विषय वस्तु, दोनों के मामले में एक विस्तृत विषय है।

परम्परागत रूप से इसकी केन्द्रीयता सामाजिक स्तर-विन्यास (या “वर्ग”), सामाजिक संबंध, सामाजिक संपर्क, धर्म, संस्कृति और विचलन पर रही है, तथा इसके दृष्टिकोण में गुणात्मक और मात्रात्मक शोध तकनीक, दोनों का समावेश है।

चूंकि अधिकांशतः मनुष्य जो कुछ भी करता है वह सामाजिक संरचना या सामाजिक गतिविधि की श्रेणी के अर्न्तगत सटीक बैठता है, समाजशास्त्र ने अपना ध्यान धीरे-धीरे अन्य विषयों जैसे, चिकित्सा, सैन्य और दंड संगठन, जन-संपर्क और यहां तक कि वैज्ञानिक ज्ञान के निर्माण में सामाजिक गतिविधियों की भूमिका पर केन्द्रित किया है।

अन्य महत्वपूर्ण लेख –

उपरोक्त लेख में हमने पाया की समाजशास्त्र के अंतर्गत समाज के विभिन्न पहलुओं – शिक्षा, सामाजिक संरचना, धर्म, जाति, आर्थिक व्यवस्था आदि का विस्तार बिनोमो दलाल की संक्षिप्त पूर्वक अध्ययन करते हैं।

इसे समाज का विज्ञान कहा गया है। विभिन्न विद्वानों ने अपने अपने मत से समाजशास्त्र को परिभाषित भी किया है।

आशा है उपरोक्त लेख आपको पसंद आया हो, आपके ज्ञान की वृद्धि हो सकी हो, संबंधित विषय से प्रश्न पूछने के लिए कमेंट बॉक्स में लिखें।

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आकाश के 270 डिग्री से 300 डिग्री तक के भाग को मकर राशि के रूप में जाना जाता है. जिस जताक के जन्‍म के बिनोमो दलाल की संक्षिप्त समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है, उस जातक का लग्‍न मकर माना जाता है. मकर लग्‍न की कुंडली में में मन का स्‍वामी चंद्रमा सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है. यह जातक लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, मॄत्यु मैथुन, चोरी, झगडा अशांति, उपद्रव, जननेंद्रिय, व्यापार, अग्निकांड इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में चंद्रमा के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

सूर्य अष्‍टम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक व्याधि, जीवन, आयु, मॄत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचार धारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, गुह्य स्थान, जेलयात्रा, अस्पताल, चीरफ़ाड आपरेशन, भूत प्रेत, जादू टोना, जीवन के भीषण दारूण दुख इत्यादि विषयों का प्रतिनिधि होता है. जातक की जन्‍मकुंडली या अपने दशाकाल में सूर्य के बलवान एवं शुभ प्रभाव में रहने से जातक को उपरोक्त विषयों में शुभ फ़ल प्राप्त होते हैं जबकि कमजोर एवम अशुभ प्रभाव में रहने से अशुभ फ़ल प्राप्त होते हैं.

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